यूपी सिडको में भ्रष्टाचार मामले में मुख्य अभियंता सहित तीन अधिकारी निलंबित

उत्तर प्रदेश स्टेट कंस्ट्रक्शन एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलेपमेंट कॉर्पोरेशन (यूपी सिडको) ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के आधार पर मुख्य अभियंता (कृष्णकांत शर्मा) सहित तीन कार्यरत अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह फैसला एक ऐसे मामले के बाद आया है, जिसमें महाराष्ट्र के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के लिए 2009 से 2016 तक किए गए लगभग 100 करोड़ रुपये के निर्माण कार्य में बिना काम किए 4.80 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। यह सिर्फ एक गलती नहीं — यह एक व्यवस्थित धोखेबाजी है, जिसमें अधिकारी और ठेकेदारों ने राज्य के निधन को लूटा।

कौन हैं निलंबित अधिकारी?

निलंबित अधिकारियों में कृष्णकांत शर्मा, जो तब अधीक्षण अभियंता थे, और अब यूपी सिडको के मुख्य अभियंता (पश्चिम) हैं, शामिल हैं। उनके साथ विनोद चंद्र पांडेय (झांसी में तैनात प्रभारी अधीक्षण अभियंता) और वासुदेव तिवारी (गाजियाबाद में सहायक अभियंता, विद्युत) भी शामिल हैं। यह तीनों अभियंता अब अपने मूल कार्यालयों से हटा दिए गए हैं। शर्मा को लखनऊ के मुख्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया है, जबकि पांडेय और तिवारी को प्रयागराज के अधीक्षण अभियंता के कार्यालय में संबद्ध कर दिया गया है।

कैसे हुआ यह धोखा?

जांच में पाया गया कि निविदा की शर्तों का पूरा उल्लंघन किया गया। विश्वविद्यालय ने निर्माण कार्य के लिए बिल नहीं पास किया था — फिर भी यूपी सिडको के अधिकारियों ने ठेकेदारों को पूरी राशि भुगतान कर दी। कोई निरीक्षण नहीं, कोई गुणवत्ता जांच नहीं, कोई डॉक्यूमेंटेशन नहीं। बस एक फर्जी बिल और हस्ताक्षर। यह तभी संभव हुआ जब अधिकारी और ठेकेदार एक दूसरे के साथ मिलकर काम कर रहे थे। यह एक ऐसा नेटवर्क है, जिसकी जड़ें 2009 तक जाती हैं।

कुल छह अधिकारी दोषी, तीन रिटायर हो चुके

जांच में कुल छह अधिकारी दोषी पाए गए। तीन कार्यरत हैं — जिन्हें अभी निलंबित किया गया। बाकी तीन रिटायर हो चुके हैं: कालका प्रसाद, ए.के. गोयल और एस.के. अवस्थी। एक और आरोपी का निधन हो चुका है। यह बात अहम है — क्योंकि जब अधिकारी रिटायर हो जाते हैं, तो उन पर कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन यूपी सिडको के प्रबंध निदेशक शिव प्रसाद ने स्पष्ट किया: "हम रिटायर्ड अधिकारियों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज करेंगे।"

ठेकेदारों को भी सजा

अधिकारियों के साथ-साथ तीन ठेकेदार कंपनियों के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू हो चुकी है। इन कंपनियों की यूपी सिडको में जमा की गई 2.5 करोड़ रुपये की सिक्योरिटी मनी जब्त कर ली गई है। इन्हें ब्लैक लिस्ट कर दिया गया है — यानी भविष्य में राज्य के किसी भी निर्माण नीलामी में इनका नाम नहीं आएगा। यह एक संदेश है: जो राज्य के पैसे को चुराते हैं, उनकी नौकरी नहीं, बल्कि उनकी बिजनेस भी खत्म हो जाएगी।

योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी का परीक्षण

योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी का परीक्षण

इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि यह अब सिर्फ एक आंतरिक जांच नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत यह एक राजनीतिक संकेत भी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अब सिर्फ निलंबन नहीं, बल्कि एफआईआर, वसूली और ब्लैक लिस्टिंग भी हो रही है। यह उन अधिकारियों के लिए डर का संदेश है, जो सोचते थे कि रिटायरमेंट के बाद सब कुछ भूल जाएगा। अब वो भी नहीं।

क्या यह मामला और बढ़ेगा?

जांच अभी शुरू हुई है। अगले दो महीनों में एफआईआर दर्ज होने की उम्मीद है। अधिकारियों के फोन रिकॉर्ड, ईमेल्स और बैंक लेन-देन की जांच भी चल रही है। यह मामला सिर्फ एक विश्वविद्यालय के निर्माण तक सीमित नहीं है। यूपी सिडको ने 2010 के बाद से 1200 से अधिक प्रोजेक्ट्स पूरे किए हैं। इनमें से कितने में ऐसा हुआ होगा? यह सवाल अभी जवाब का इंतजार कर रहा है।

वसूली का नया नियम

यहाँ एक नया बदलाव आया है: अब गबन की गई राशि की वसूली का दायित्व अधिकारियों पर नहीं, बल्कि उनके परिवारों पर भी डाला जा सकता है। यूपी सिडको के अनुसार, अगर कोई अधिकारी रिटायर हो चुका है और उसके पास जमा धन है, तो उसे वसूला जाएगा। यह एक ऐसा नियम है जिसे अभी तक किसी भी राज्य ने नहीं लागू किया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूपी सिडको क्या है और यह किस विभाग के अधीन है?

यूपी सिडको, यानी उत्तर प्रदेश स्टेट कंस्ट्रक्शन एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलेपमेंट कॉर्पोरेशन, राज्य सरकार के समाज कल्याण विभाग के अधीन काम करता है। इसका मुख्यालय लखनऊ में है और यह राज्य के विभिन्न सामाजिक और शिक्षा संस्थानों के निर्माण कार्यों को संभालता है।

इस मामले में कितनी राशि का गबन हुआ है?

इस मामले में लगभग 4.80 करोड़ रुपये का गबन पाया गया है, जो महाराष्ट्र के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के लिए 2009-2016 के बीच किए गए 100 करोड़ रुपये के निर्माण कार्य से संबंधित है। बिना काम किए इस राशि का भुगतान किया गया।

क्या रिटायर हो चुके अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी?

हाँ, तीन रिटायर्ड अधिकारियों — कालका प्रसाद, ए.के. गोयल और एस.के. अवस्थी — के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की जाएगी। यूपी सिडको के प्रबंध निदेशक शिव प्रसाद ने स्पष्ट किया है कि रिटायरमेंट के बाद भी भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदारी लेनी होगी।

ठेकेदार कंपनियों को क्या सजा मिलेगी?

तीन ठेकेदार कंपनियों की 2.5 करोड़ रुपये की सिक्योरिटी मनी जब्त कर ली गई है। इन्हें ब्लैक लिस्ट कर दिया गया है, जिसका मतलब है कि वे भविष्य में किसी भी राज्य निर्माण नीलामी में भाग नहीं ले सकेंगे। इनके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज होगी।

इस घोटाले के पीछे क्या वजह है?

इस घोटाले के पीछे एक बुनियादी समस्या है — निरीक्षण और लेखा प्रणाली में ढील। बिल बिना निरीक्षण के पास हो रहे थे, और अधिकारी और ठेकेदारों के बीच संबंध इतने घनिष्ठ थे कि कोई जांच नहीं हो पा रही थी।

क्या यह मामला अन्य राज्यों में भी हो सकता है?

बिल्कुल। भारत के कई राज्यों में सिडको जैसे निगम अपने आप में एक अलग दुनिया हैं। जहाँ लेखा और निरीक्षण कमजोर है, वहाँ ऐसे घोटाले होना स्वाभाविक है। यूपी का यह मामला दूसरे राज्यों के लिए एक चेतावनी है।